बदनाम/ट्रोल हुई लघुकथाएं
सम्पादकीय
प्रकाशन के क्षेत्र में लेखकों को धंधेबाजों से बचाने के लिए *हर्ष पब्लिकेशन्स* की स्थापना की गई है। इसे विशुद्ध रूप से साहित्यिक प्रकाशन संस्थान बनाने का हमारा प्रयास रहा। इसमें किसी का कोई भी व्यावसायिक हित नहीं है।
प्रकाशन का यह मानना है कि साहित्यकारों को प्रगतिशील होना ही चाहिए। ऐसे में प्रकाशन की पहली पुस्तक का नाम सोशल मीडिया की बदनाम लघुकथाएँ रखने का प्रस्ताव पारित हुआ। इस संग्रह में ऐसे लघुकथाकार जो बहुत ज्यादह ट्रोल होते हैं उनकी ट्रोल की गई लघुकथा को स्थान देने की घोषणा की गयी थी। निश्चित ही ट्रोल होने के कारण रचनाकार का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है, और वह लेखन के काई बार किनारा करने का विचार भी बना लेता है जबकि वास्तव में उनकी वे ही लघुकथाएँ मारक और उद्वेलित कर पाने में समर्थ होती हैं। उम्मीद थी कि इस यज्ञ में अनेक आहुतियाँ आएँगी लेकिन आशा के विपरीत बहुत कम रचनाकारों ने साहस दिखाया, असल में वे ही निर्भीक रचनाकार भी हैं। रचनाकारों की रचनाएँ बिना किसी संशोधन के यहाँ प्रकाशित की जा रही हैं।
यह भी विदित हो कि रचनाकारों के विषय, कथानक, कथ्य से संपादक का कोई सरोकार नहीं है। इन रचनाओ के प्रकाशन का उद्देश्य किसी की राजनितिक, धार्मिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक भावनाओं को आहत करना बिलकुल नहीं है। वैसे हमारा स्पस्ट मानना है कि किसी कि भावनाएं इतनी सस्ती नहीं होनी चाहिए कि वे यूँ एक लेखक, एक पत्रकार या एक व्यंग्य लेखक कि रचना से आहत हो जाएँ।
आशा है कि लघुकथा के इस संकलन को आप पाठको का प्यार मिलेगा।
जल्दी ही अन्य विषयों के साथ फिर हाजिर होंगे।
सन्दीप तोमर
(संपादक)
अशोक यादव
आजादी
प्रणय बेतहाशा रवीश का दरवाजा पीट रहा था। घर में घुसते ही वह बोला-
"बन्द करो तुम्हारी यह बकवास। तुम्हें डर नहीं लगता?"
"तुम्हें लगता है?"
झेंप मिटाते हुए प्रणय बोला-
"यार! वो बहुत ताकतवर लोग हैं।"
कहते-सुनते दोनों लोग मेज के आमने सामने लगी कुर्सियों पर बैठ गए। प्रणय गुस्से में उसकी ओर देखे जा रहा था और रवीश अपनी कलम उठाकर उससे ऐसे खेलने लगा जैसे प्रणय को अपनी ताकत दिखा रहा हो। झुंझलाकर प्रणय फिर बरसा-
"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। तुम यह सब किसलिए कर रहे हो ?"
"आजादी के लिए!"
"किसकी आजादी?"
"मेरी आजादी...तुम्हारी आजादी...और...और...करोडों करोड़ लोगों की आजादी..."
"किससे आजादी की बात कर रहे हो ?"
"इन मुट्ठीभर लोगों से..."
"तुम मान जाओ, यार! अब तो हद हो गयी...हम लोगों के पास भी फोन आने लगे हैं...कि उसे समझाओ..."
"क्या कर लेंगे...जान ही तो ले लेंगे...जैसे डफने कारूआना ग्लेज़िया, गौरी लंकेश, कलबुर्गी, दाभोलकर...और...और ये कमजोर लोग कर भी क्या सकते हैं? फिर तुम कलम उठा लेना..."
कहकर वह ऐसे हँस दिया कि मानो कोई बात ही न हो।
"रविश! तुम समझते नहीं हो। जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो, वो लोग अपनी जिंदगी जी चुके थे। तुम्हारी उम्र देखो..."
"और भगत सिंह की उम्र..."
संशय भरे रास्ते पर निकलते हुए रवीश में प्रणय को भगत सिंह का अक्स दिखाई दे रहा था।
विनोद सिल्ला
01.
लॉकडाउन
लॉकडाउन में सब बंद है। रामलाल तुम गाड़ी में कहाँ घूम के आए हो?
घूमना तो क्या भाई श्यामलाल एक रिश्तेदारी में जा कर आए हैं।
टेलिविजन के समाचारों में तो बाहर निकलने वालों को पुलिस मुर्गा बना-बना कर पीट रही थी। तुम्हें नहीं रोका-टोका?
अरे यार पुलिस तो पैदल, रिक्शा चालक, साईकिल चालक व मजदूरों को मुर्गा बना-बना कर पीट रही थी। हम तो मंहगी गाड़ी में थे। किसी की रोकने की हिम्मत ही नहीं हुई।
02.
समाचार
विवेक कोरोना महामारी को लेकर “प्रधानमंत्री केयर फंड” में दान करके गर्व महसूस कर रहा था।
अपने सहकर्मियों को भी दान करने के लिए प्रेरित कर रहा था।
वह दान करके सोच रहा था कि उसके दान किए धन से गरीब श्रमिकों का भला होगा।
तदुपरांत श्रमिकों की भुखमरी, पैदल हजारों किलोमीटर चलने के समाचार देखे तथा अमीरजादों को विशेष विमान से, विदेश से लाने के समाचार देखे।
समाचारों ने व अखबारों ने उसे विचलित कर दिया। वह अपने आप को ठगा-सा महसूस कर रहा था।
03.
बात हजम नहीं हुई
रेलवे स्टेशन पर रमेश बाबू, सुबह-सुबह पूछताछ खिड़की की अपनी सीट पर, बैठे ही थे। उनका मोबाईल फोन घनघना उठा। स्क्रीन पर नाम था “पंडित जी”।
पूछताछ बाबू बुदबुदाने लगा, ये फोन किस लिए आया? चेहरे पर झुंझलाहट के भावों के साथ, स्क्रीन पर ऊंगली मार कर, फोन कान पर लगाया। सवाल दागा कौन?
दूसरी ओर से आवाज आई “मैं फलां ज्योतिषाचार्य बोल रहा हूँ। कल आप पत्नी के साथ हस्तरेखाएं दिखाने आए थे।
मैं पूछ रहा था कि इलाहाबाद यानि प्रयागराज जाने वाली रेलगाड़ी किस-किस समय जाती हैंॽ
पूछताछ बाबू ने कहा, “कल तो आप लाखों किलोमीटर दूर स्थित खगोलीय पिंडों की चाल तक बता रहे थे। आज रेलगाड़ी की चाल की भी पूछताछ कर रहे हो। बात कुछ हजम नहीं हुई।
ज्योतिषाचार्य ने हैल्लो-हैल्लो करके फोन काट दिया।
04.
नीति
चमचे ने मंत्री से परेशानी जताते हुए कहा, “सरकार की नई नीति से करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए।”
मंत्री जी बोले, “तो क्या हुआ?”
चमचा बोला, “आगामी चुनाव में हमें वोट कौन देगा?”
मंत्री जी ने हंसते हुए कहा, “वोट नीतियों से नहीं, ई. वी. एम. से मिलता है।’
सुनकर चमचा भी खिलखिला कर हंस पड़ा।”
नज्म सुभाष
1
ठंडी चाय
"घर वालों को चकमा देकर लड़की अपने प्रेमी के साथ फरार"
द्वारिका बाबू को अखबार खोलते ही ये हेडिंग दिखी तो उनके दिमाग की सारी नसें चटक गयीं...आगे खबर विस्तार से थी मगर उन्हें महसूस हुआ कि आंखों के आगे अंधेरा छा गया है और आगे की खबर पढ़ पाना उनके बूते से बाहर है।वो मन ही मन बुदबुदाए-" कम्बखत को माँ बाप का जरा भी खयाल नहीं आया...जिसे इतने नाजों से पाला होगा ,पढ़ाया लिखाया होगा वही लड़की बाप की नाक कटवाकर प्रेमी के साथ रंगरेलियाँ मनाने चली गयी...थू है ऐसी औलादों पर..."
उनका मुंह कसैला हो गया था।
"बाबूजी चाय"- दिव्या ने चाय की कप मेज पर रखते हुए कहा मगर बाबूजी न जाने कहाँ खोये थे
उन्होंने सुना ही नहीं।
"बाबूजी...क्या हुआ"
उसने दुबारा आवाज दी तो जैसे वो नींद से एकाएक जागे।
"आं... हाँ... ठीक है रख दो " वो बेखयाली में बोल गये
"क्या हुआ बाबूजी? आप कहाँ खोये थे?"
"कुछ नहीं दिव्या... आजकल के लड़के लड़कियाँ इतने बेशर्म हो गये हैं कि क्या कहूं... घिन आती है ऐसी औलादों पर... माँ बाप की इज्जत का तो जरा भी खयाल नहीं"
"बाबूजी आप भी न.... कुछ बताएंगे या सिर्फ पहेलियाँ बुझाएंगे... आखिर हुआ क्या?"
इसबार उन्होंने अखबार आगे कर दिया और चीखे-" माँ बाप की इज्ज़त का जनाजा निकालने वाली ऐसी औलादों का क्या भविष्य होगा... इनको तो गोली मार देनी चाहिए"
"गलतियाँ किसी से भी हो सकती हैं बाबूजी"
"ये गलती नहीं माँ बाप के मुंह पर तमाचा है।"
"तब तो इन्होंने गोली मारने वाला ही काम किया है... मगर आप किसे किसे गोली मारेंगे?"
"मैं कुछ समझा नहीं... तुम कहना क्या चाहती हो?" उनके चेहरे पर उलझनें दृष्टिगोचर होने लगीं।
"बाबू जी मैं तो कभी इन सब चक्करों में नहीं पड़ी... आपने जैसा चाहा वैसा किया... फिर मैं शादी होने के बावजूद पांच साल से यहाँ क्यों हूं?... आखिर मेरा भविष्य क्या है? "
"मुझे क्या पता था राजीव इतना कमीना होगा कि पैसों के लिए तुम्हारी जिंदगी तक लेने को उतारू होगा"
"पसंद आपने ही किया था बाबूजी"
"तुम्हारा दुख समझ सकता हूं बेटी... मैं उस कमीने को समझ न पाया...मुझसे गलती हुई"
"और इस गलती का परिणाम जीवन भर मैं भुगतूं?"
"दिव्या..."
उसके लफ़्ज सीधे उनके मर्म को भेद गये थे वो तड़पकर रह गये इसका कोई जवाब उनके पास न था।
"बाबूजी तो अब बताइए न....आप किसे किसे गोली मारेंगें?"
द्वारिका बाबू को महसूस हुआ एक तेज रफ्तार गोली उनके जिगर के पार होकर गुजर गयी है। उन्होंने कसमसाकर पहलू बदला और अखबार उठाकर उस पर नजरें गड़ा दीं।
दिव्या अब भी खड़ी उनके जवाब का इंतजार कर रही है।मेज पर रखी चाय उसके अरमानों की तरह ठंडी हो चुकी है जिस पर मक्खियों ने डेरा जमा लिया है।
2.
भीड़
"भीड़ का कोई ईमान नहीं होता" ये रटा रटाया जुमला सुनते-सुनते कान पक चुके हैं...मगर ये जान लीजिए... सच इतना भर नहीं है... भीड़ का कोई ईमान न होता तो भीड़ इकट्ठी कैसे हो जाती? आखिर कोई तो डोर होगी जो इन सबको बाँधे होगी,जहरीली हवाएं यूँ ही नहीं चलतीं..कोई तो पेड़ होगा जो जड़ से लेकर पत्ती तक जहरीला होगा और ये हवाएं उसी को छू कर आती होंगी... और आज यही भीड़ भारतीय संस्कृति को बचाने सड़क पर उतर आयी थी...
"अबे रूक..." भीड़ चीखी
एक मुल्ले जैसे आदमी के चेहरे पर पसीना चुचुहा आया,सहमी आँखें "जय श्रीराम और गोमाता के रक्षक हम " जैसे नारे सुनकर दहशत से सिकुड़ गयीं,
छठी इन्द्री ने किसी अनहोनी का भान पहले ही करा दिया...वो गाड़ी रोकना नही भगाना चाहता था पर कहां..? पूरी सड़क पर तो भीड़ थी।मजबूरी थी।उसने गाडी रोक दी।
"इसकी तलाशी लो"...
भीड़ चीखी- "डिक्की खोल"
वह डिक्की खोलने के लिए चाभी लगाता उसने पहले ही चाभी छीन ली गयी।
"ये क्या है काली पन्नी में"
'ममम.... छ... ली है साब'- बड़ी मुश्किल से वो थूक गटक पाया
'झूठ बोलता है साला... हमें पक्की खबर मिली है'
अबतक किसी ने पन्नी का माँस सड़क पर छितरा दिया था
" य क्या है?
"मछली ही तो है"
"कैसे मान लूँ?'
"साब मछली के शल्क तो ऊपर से ही दिख रहे हैं... और फिर इसकी हड्डियाँ कंघीनुमा होती हैं"
'तो क्या गाय बिन हड्डी की होती है'
'इतनी बारीक हड्डियाँ गाय की नहीं होती साब... वो रो पड़ा
'अबे सुअर की औलाद... आजकल पॉलीथीन खा- खाकर गाय की हड्डियाँ भी बहुत हल्की हो गयी हैं... तू हमें समझा रहा है... मारो साले को"
एक घंटे बाद न्यूज चेनल चीख रहे थे- 'उन्मादी भीड़ ने बीफ के शक में एक मुसलमान को पीट पीटकर मार डाला, दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है,मौके पर बरामद किया गया माँस परीक्षण के लिए लैब भेजा गया"
मैं इसपर सोच ही रहा था कि पत्नी भोजन की थाली रख गयी..सोयाबीन,आलू की सब्जी और गर्मागरम रोटियाँ... सोयाबीन मुझे बेहद पसंद है। मैंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर सोयाबीन को उसमे समेट ना चाहा पर वो फिसला और कुछ दूर जाकर माँस के टुकड़े मे तब्दील हो गया... बीफ... मेरी आंखों मे लहू उतर आया... ये साले मुल्ले... मैं चीखा और अगले ही पल मैं भी भीड़ में शामिल हो चुका था
3
अग्निसाक्षी
किसी भी हाल में आज प्रहलाद को बचना नहीं चाहिए। महाराज का कड़ा आदेश है। सेवक बेमन से ही सही सारी सामग्री एकत्र करने में जुटे हुए थे। लकड़ियों के साथ साथ घी-तेल भी। होलिका आत्मग्लानि से भर गयी। क्या एक वरदान उसके लिए अभिशाप बन जाएगा.?
कैसे जी पाएगी वो? इस अभिशाप को ढोते हुए...इस कलंक के साथ... जिस प्रहलाद को उसने गोद में खिलाया... शनैः शनैः बढ़ते हुए देखा... जिस पर अपना वात्सल्य लुटाया... आज उसे मारने के लिए नियति ने उसे चुना।उफ्फ... महाराज की आंखों में दहकते अंगारे... जैसे उसके कक्ष में भी उसका पीछा कर रहे थे। एक पल को वह कांप गयी किंतु दृढ़ता से बोली-"महाराज प्रहलाद मेरे पुत्र समान है... मैं उसकी मृत्यु का कारण बनूँ?... मुझसे न होगा।
"होलिका... ये तुम्हारे भाई का नहीं... महराज का आदेश है और इस आदेश के उल्लंघन का प्रतिफल जानती हो?"
" मृत्युदंड...यही न महाराज"
हो....sss. लि. Sss... काsssssss " चीख उठा हिरण्यकशिपु।
अपने कक्ष में बैठी होलिका को लगातार महाराज की दहकती आँखें घूरती रहीं।
लकड़ियाँ धूं-धूं करते हुए जल रही थी। और लपटें आकाश छूने को व्याकुल...। होलिका प्रहलाद को लेकर प्रज्जवलित अग्नि की तरफ बढ़ने लगी।मश्तिष्क में अनेक झंझावत उबल रहे थे।
महाराज.... अपने विवाह की शर्त पर एक पुत्र तुल्य बालक की हत्यारिन... नहीं... नहीं... कभी नहीं ..धिक्कार है ऐसे जीवन पर.... माफ करना इलोजी... जब तक आप यहाँ पहुंचेंग... मैं राख हो चुकी होऊंगी... हमारा प्रणय संभव नहीं...अगले जन्म में... हम मिलेंगे जरूर... मेरी प्रतीक्षा करना इलोजी...।
हे अग्निदेव
आप साक्षी रहना हमारे हृदय में प्रहलाद के लिए सिर्फ और सिर्फ वात्सल्य है। एक स्त्री अपने जिन गुणों के लिए जानी जाती है... उनकी तिलांजलि... कदापि नहीं... ।
पूरा नगर ये मार्मिक नजारा देखने के लिए एकत्र था ।सबकी आंखों में अश्रुकण झिलमिला रहे थे। क्या एक अबोध बालक की घातिनी उसकी अपनी ही बुआ बनेगी?
हर उठती निगाह इसी प्रश्न मे उलझी थी
होलिका प्रहृलाद को लेकर अग्नि के एकदम समीप पहुंच चुकी थी। निमिष के भी हजारवें हिस्से में उसने अपना अग्निरोधी वस्त्र प्रहृलाद को ओढ़ाकर उसके साथ अग्नि में प्रवेश कर गयी। कोई कुछ समझ पाता... उससे पहले ही अग्नि ने प्रचंड रूप धारण कर लिया।
4
अहसास
जिस समय रामलाल की शादी लायक उम्र थी जो भी रिश्ता आया उनके बाप ने इतना बड़ा मुंह खोला कि लड़की वाले ने कभी अपना सामर्थ्य देखा कभी उनका खुला मुंह... बात क्या बनती... लिहाजा उनका मुंह ही खुला रह गया... फिर एक दुर्घटना में रामलाल का एक पैर भी फ्रेक्चर हो गया लिहाजा गांव में ही बांस की खपच्चियों के सहारे पैर जोड़ तो दिया गया मगर... जब खपच्चियाँ खुलीं तो पैर टेढ़ा हो चुका था। एक लाठी ही उनकी हमेशा की संगिनी थी। ऐसे हालात में कोई फ्री में भी रामलाल से शादी करने को तैयार नहीं था।खैर,अब न तो माँ है न बाप... सिर्फ एक अकेलापन ही है जो उनके साथ साये की तरह इधर उधर डोलता रहता है।
इस वक्त वो घर में बैठा अपनी खुरदरी हथेली को बड़े गौर से देख रहा था... मात्र मोटे-मोटे उभर आये ठड्ढों के जाल के अलावा उनमे कुछ न था... स्त्रीसुख की तरह उसकी सारी लकीरें भी धूमिल थीं। उम्र के इस पड़ाव पर सारी धराशाई उम्मीदें... आजतक खुरपी, हंसिया, लाठी जैसी खुरदरी चीजों के इतर कोई मखमली अहसास उनके हाथों से न गुजरा...
शाम होने वाली थी। घर में बैठा-बैठा वो ऊब रहा था। उसने अपनी लाठी उठाई और खेत की ओर चल पड़ा। मकई इस समय अपने पूरे शवाब पर थी। भुट्टों से बाहर झांकती सफेद और कत्थई मूंछें जब वो देखता तो महसूस होता ये एकदम उसकी ही मूछें हैं...।
खेत के पास पहुंचकर उसे महसूस हुआ खेत में कोई है... तमाम अस्पष्ट सी आवाजें फिजां में तैर रही थी।
"कउन है हियाँ?" पहले उसने सोचा चीख कर यही पूछे किंतु ठिठक गया। कोई भुट्टा चोर होगा तो भाग जाएगा। लिहाजा वो आहिस्ता आहिस्ता आवाजों की तरफ बढ़ा।कुछ कदम चलने के बाद उसे लगा कि आवाजें करीब हैं... उसने जरा दूर नजर डाली... उफ्फ्... उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी। दो जवां जिस्म जमीन पर लेटे प्रेमालाप में मग्न थे- दोनों इस वक्त किसी और ही दुनिया मे ये भूलकर विचरण कर रहे थे कि दो और आँखें भी लगातार उन्हे घूरे जा रही हैं।
रामलाल का दिमाग सनसना उठा जैसे चिंगारियाँ फूट पड़ी हों।कानों के लवे सुर्ख हो गये।गुंथी हुई सांसों का तूफान उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रहा था
"सरउ... हमरे खेतवा मइहां यू सब..."
वो चीखना चाहता था मगर होंठ जैसे जकड़े थे याकि कोई ताले जड़ गया था।
"रामलाल... मउका है...आजु तौ मारि देव चउका..." उसके मस्तिष्क में लहर उठी।उसके मन में लड्डू फूटा...
"हिरनी जाल मइहां है... बदनामी केरे डेर से मना न करी..."
वो दो कदम आगे बढ़ा... शिकार मात्र 5-6 कदम की दूरी पर था।उसने एकबार फिर गौर से लड़की को देखा...17-18 साल उम्र...एकदम कमसिन...फिर अपनी खिचड़ी हो रही कत्थई मूछों की याद... उम्र का एक लम्बा फासला.... अगर वक्त पर शादी हुई होती तो इतनी ही उम्र तक...।
" न... न... पाप... पाप होइ यू... राम राम...
"रामलाल... बेटी जस दिखतै तौ है...बेटी तौ न....आज मउका है... चूकौ मत।"
उसके दिल ने फिर सरगोशी की। वो दो कदम आगे बढ़ा... मगर बेवशी उसके चेहरे पर दुबारा पसर गयी।
वो चार कदम पीछे लौट आया। अब वो ठगा-सा खड़ा था कि अचानक प्रेमालाप का तूफान थम गया। लड़का झटके से उठा। कोई गुब्बारे जैसी चीज उंगली में लपेटी और गांठ लगाकर दूर उछाल दी। रामलाल अपने मे ही सिमट गया... कहीं नजरें चार न हो जायें। इसवक्त जैसे वो ही अपराधी था।
लड़की कपड़े पहन चुकी थी। अब तक दोनों एक दूसरे के विपरीत दिशा में बढ़ चुके थे। अपराधी की तरह खड़े रामलाल का पूरा शरीर दहक रहा था। धड़कने जैसे फेफड़े फाड़कर बाहर आना चाहती थीं।वो लड़के द्वारा फेंकी गयी चीज की तरफ बढ़ा। पहले लाठी से उसे इधर उधर पलटता रहा फिर झुककर उसे हाथों मे उठा लिया और आँखें बंद कर लीं। महसूस हुआ एक मखमली सा अहसास उसके हाथों में समा रहा है।
मुकेश कुमार “ऋषि”
चेतावनी
दरोगा अभय यादव की शैतानियत से बच्चा-बच्चा परिचित था । रिश्वत खाने की उसे ऐसी बीमारी थी कि आदमी कितना भी गरीब हो उससे उसे पैसा चाहिए ही चाहिए ।
रात को एक मामला थाने में आया। झगड़ा पारिवारिक था, फिर भी रफा-दफा करने के बजाय अभय यादव ने उसे उलझा दिया। पूरे दो घंटे थर्ड डिग्री दी और बीस हजार में अभय यादव ने अपने कंधों के सितारों का सौदा उस गरीब से कर दिया।
उस गरीब ने पैसे जुटाने की भरपूर कोशिश की पर किसी ने उसे फूटी कौड़ी न दी। मजबूरन उसे अपनी दूध देती भैंस बूचड़ खाने वालों को बेचनी पड़ी। बीस हजार लेकर अभय यादव निकला मौज-मस्ती के लिए। मुफ्त के पैसों की बहुत गर्मी होती है। हवा खाने के लिए अभय यादव ने अपनी बुलैट वाइक की गति और तीव्र कर दी, तभी पता नहीं कहां से विदेशी नस्ल का काला सांड आकर बीच सड़क पर प्रकट हो गया। अभय यादव कुछ सोचते- समझते तब तक वे हवा में उड़ गये...।
पूरी रात बेहोश रहे, सुबह होश आया तो हॉस्पिटल के बेड पर पड़े थे। दांत गायब, पैरों की हड्डियों का चूर्ण बन गया, बायाँ हाथ धनुष बन गया। बस न जाने कैसे पाप के तालाब में पुण्य का एक छोटा सा कमल खिल गया कि जान बच गई। या यूँ कहें कि ईश्वर की चेतावनी थी कि बेटा सुधर जा, ये वर्दी, ये पॉवर सदा न रहेंगे, कर्म सुधार ले।
पूनम झा
1
धरती-पुत्र
"साहब कोनो काम हो तो कहो हम कर देंगे।" एक अधेड़ सा व्यक्ति राजेन्द्र जी से कह रहा था। वेशभूषा से वो मजदूर नहीं लग रहा था। लेकिन बहुत अमीर भी नहीं लग रहा था। किसान जैसा दिख रहा था।
राजेंद्र जी-"कौन सा काम करोगे?"
"कोनो। जैसे बाग बगीचे की साफ-सफाई।"
"वैसे तो माली सब कर जाता है, किन्तु पीछे पेड़ों के नीचे कुछ जंगल सा हो रहा है। क्या तुम से हो जाएगा?" राजेंद्र जी उसकी उम्र और वेषभूषा को देखते हुए शंका जताते हुए पूछा।
"हाँ...हाँ. साहब सब हो जागा।"
"कितना लोगे?"
"पूरे दिन की मजूरी दे देना साहब। बहुत अच्छे से साफ कर ।"
"ठीक है।" कहकर उसे कुदाल और खुरपी देते हुए राजेंद्र जी ने पूछा- "तुम कहाँ रहते हो?"
अधेड़-"हम तो साहब यहाँ से 40किलोमीटर दूर गांव में रहत छूं।"
"वहां घर है?"
"साहब गाँव में खेती है म्हारे। बहुत जमीन छे। ट्रेक्टर छे। ट्रैक्टर सं खेत जोतबा छूं। अबार महारे खेत में सोयाबीन का पौधा लहलहाई रहल छे।" अधेड़ के चेहरे पर हरियाली साफ-साफ झलक रही थी।
"जब इतना कुछ है तो फिर यहाँ काम क्यों?" राजेंद्र जी कुछ अचंभित होके पूछे ।
"अब का बताएं साहब!... काश्तकार सब भूखो मरे छे। बीज बोवा खातिर कर्ज लेनो पड़ै छे।"
"अच्छा-अच्छा... ऐसा क्यों?" राजेंद्र बाबू सवालिया नजरों से उसे देखते हुए बोले। वैसे तो आये दिन किसानों की आत्महत्या के बारे समाचार पत्र और टीवी में देखने को मिलता रहता है। आज साक्षात्कार हो गया तो जिज्ञासा बढ गई।
"उपज बहुत कम कीमत में बिके छे। पूरा साल ऊ से घरखर्च कैसे चलोगो?" उसने ही सवाल पूछ लिया।
".........."
"एही से लोगबाग सूद पर पैसा उधार ले लेत छ। हम कर्जा ना लेई छूं ।"
"अच्छा ........"
"साहब हम जमीन से जुड़ल लोग छूं। अबार सोयाबीन पकवा में देर छे । बैठ के का करब? हाथ पैर चलात रहे के चाहे और कोनो काम करवा में शरम काहे । कछु दिन बाद अपना खेत से फुरसत नाही। फुरसत में इधर-उधर कछु कमा ले छूं । जे से घर चलबा में आसानी हो जावा छो।" अधेड़ कुदाल उठाते हुए कहा।
"अच्छा! आप चलिये अभी चाय बनवाकर भिजवाते हैं।" राजेन्द्र जी को वो मजदूर नहीं धरती पुत्र लग रहा था।
अबला कौन?
अपनी सीट ढ़ूंढ़ते हुए रश्मि कंपार्टमेन्ट में आगे बढ़ती जा रही थी। ऊपर का बर्थ था।
“बेटा! आप कहाँ तक जाओगे ?”- रश्मि ने पूछा।
वो नौजवान —“दिल्ली।“
रश्मि को भी वहीं जाना था।
रश्मि—“बेटा! मेरा बर्थ ऊपर वाला है, क्या आप ऊपर...?”
नौजवान नहीं में सिर हिलाया।
रश्मि-“आप तो नौजवान हो?”
नौजवान—“नीचे वाली सीट के लिए मैंने दो टिकट कैंसिल करवाये हैं।“
रश्मि-“क्यों आपका स्वास्थ्य खराब है?”
“नहीं।“-नौजवान दूसरी तरफ देखते हुए कहा।
रश्मि अपना पर्स ऊपर रखते हुए सोच रही थी कि ‘अबला कौन?’
कुसुम शर्मा “नीमच”
1
आक्सीजन
कितना शोर है;… आक्सीजन का मास्क मुँह पर ढाँकती नर्स बड़बड़ा उठी!
आह! ...”सिस्टर धीरे;.. चुभता है।“ पति की आह पर अटेंडर पत्नी धीरे से बोली।..तब तक नर्स मास्क मुँह पर फँसा कर जा चुकी थी।
बाहर शोर था। तीन पैक्ड बॉडी जिन्हें सौंपी गई थी। वे उनके परिजन थे ही नही: एक बॉडी का मुँह खोला गया तब पता चला।
“सिस्टर... वो... वो...उनकी साँस... आक्सीजन मास्क लीक है” घबराई पत्नी पुनः दौड़ी।
अभी मैं बॉडी का कंफर्मेशन देखूँ कि तुम्हारे पति की आक्सीजन!
आँखों में आँसू और याचना दोनो को देख शायद मन द्रवित हुआ, आक्सीजन मास्क बदलने पहुँची।
आँखे आकाश को निहारती, साँस लेने की कोशिश में पूरा मुँह खुला था।
एक बॉडी और लिपट रही थी हरी पॉलीथिन में।
2
नातरा-1
“नहीं, बिल्कुल नही करना “नाता”इसे अपने पति से सुलह करके उसी घर में जाना होगा।“
दादी ने अपना फैसला सुना दिया था।
आज कौशल्या फिर अपनें मायके आ गई थी, पति से उसका झगड़ा हुआ था।
कौशल्या का बाल विवाह 11 वर्ष की उम्र में हुआ था,16 की होते होते बिदाई दे दी,लेकिन कच्ची उम्र में जिम्मेदारी का दबाव बर्दाश्त न हुआ ।
माता पिता ने आपसी बैठक कर निष्कर्ष स्वरूप रिश्ता तोड़कर, पुनः अन्यत्र “नातरा” कर दिया ।
कौशल्या के पुनः आने, और ससुराल न जाने की जिद ने दादी को आक्रोशीत कर दिया।
“तू लड़कर आती रह, तेरा बाप फिर पैसे लेकर नया नातरा कर देगा, बस यही चलता रहेगा।जैसें मेरे बाप ने चार जगह नातरा करके मुझे “वेश्या” ही बना डाला। खुद उस पैसे से दारू पीकर मर गया।“
“में तो अनपढ़ गंवार थी..., करमजली तू तो चार किताबें पढ़ी है..., समझदारी रख, कब समझेगी ये..., जो ले जाएगा चार दिन नखरे उठाएगा।.”समझौता” करना ही है तो अब गृहस्थी से कर “शरीर” से न कर।
औऱ लकड़ी की ठक- ठक संग बाहर दालान में जाकर लेट गई। कौशल्या के मन के किंवाड़ खुल रहे थे। जैसे बिना सांकल के किवाड़ हल्की हवा से भी ढुलक जाते है।
3
नातरा-2
आज एक बार फिर उषा का नातरा था।
हारी सी उदास सी... एक बार फिर शादी के नए जोड़े में बैठी थी।
“के छोरी मूंडो चढ़ाकर बैठी है। राजी हो घणो पइसा वालो है..., थारो नवों लाडो” दादी ने उसके चेहरे की उदासी को दूर करने का प्रयास किया।
फफककर रो पड़ी उषा—“दादी सा बचपन से अब तक म्हारा तीसरा ब्याह है।...कब तक? चलो बचपन तो कोई बात नही नासमझ थी, पर दूजा ब्याह... वो तो बापू सा ने सोचसमझकर किया था न!.... और में तो सब सहन कर रही थी, उनके गहने पैसे और मुझे सबको अपने पास रख लिया।“
दादी ने गले लगा लिया।
“देख छोरी तेरे दादा की में पाँचवी लुगाई थी और वे मेरे चौथे पति।“
हमारे मेवाड़ में बेटी नही नोट बनाने की मशीन पैदा करते है। तू अनोखी नही।
“पर दादी सा मुझे ये नातरा नही करना, ये तो सहमति की वेश्यावृत्ति ही हुई न?”
दादी पोती दोनो टिकिट लेकर बस में बैठ चुकी थी।
अंजू खरबंदा
मुक्ति
ठक ठक ठक!
हथौड़े की आवाज ने मनीषा की तंद्रा भंग हुई ।
वकील साहब सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे और उसका मन अन्धकार की गुहा में उजाले की किरण खोज रहा था ।
शादी के सत्ताईस साल बाद तलाक!
च्च च्च!
हें हें हें ।
सामने कुर्सियों पर बैठे लोगों में अचरज से अधिक उपहास दिखलाई पड़ता था ।
"जहाँ इतनी जिन्दगी काट ली वहाँ बाकी की क्यों नहीं कट सकती?"
"अठारह बरस की थी जब माँ बाप ने ब्याहा दिया खाते-पीते घर का कमाऊ बेटा देख न उन्होंने कुछ सोचा न मैंने । तकदीर की आँखों में भला कोई धूल झोंक पाया है आज तक!"
"तो अब ऐसा क्या हुआ?"
"गृहस्थी की चक्की में न दिन देखा न रात! न कभी अपनी इच्छा सोची न सहूलियत!"
"तो फिर अब एकाएक ऐसा क्या हो गया?"
"शादी हुई बच्चे हुए सबके लिये जी!
वकील साहब, एकाएक कुछ नहीं होता ।
चिंगारी अंदर ही अंदर सुलगती रहती है...
बस अब अपने लिये जीना चाहती हूँ ।"
एक लम्बा उच्छ्वास छोड़ते हुए उसने जवाब दिया ।
"अपने लिये जीने के लिये तलाक का रास्ता ही क्यों?"
"बच्चों की शादी हुई तो सब बोले चलो गंगा नहा ली। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिम्मेदारियाँ दिन प्रति दिन बढ़ती चली गईं।"
"तो जिम्मेदारियों से बचने के लिये तलाक चाहिए?"
"नहीं! बस कुछ पल अपने हिसाब से जीने के लिये मुक्ति चाहिए।"
गीता चौबे “गूंज”
चुप्पी
"ये कैसे हो गया भाभी…? माँ के शरीर में पूजा के दीपक से कैसे आग लग गयी ? माँ ने तो पूजा-पाठ भी छोड़ दिया था…?"
"क्या बताऊँ… सब मेरी गलती है। कल माँजी ने कहा कि पापाजी की बरसी है तो एक दीपक जलाकर सिरहाने के टेबुल पर रख दो। मैंने उनकी भावनाओं का ख्याल रखते हुए उनकी बात मान ली। काश! मैंने उनकी यह बात न मानी होती"… कहकर भाभी प्रिया इतनी फूट-फूटकर रोने लगी कि किरण स्वयं को भूल भाभी को चुप कराने लगी,
"अब होनी को कौन टाल सकता है भाभी, आप गिल्ट फील न करें। माँ के साथ इतना ही साथ था हमारा। हमें अपने आप को संभालना होगा। भईया-भाभी! माँ के अंतिम संस्कार में होनेवाले खर्चों में मैं भी कुछ सहयोग करना चाहती हूँ ... कहकर किरण दूसरे कमरे में रखे अपने पर्स से पैसे लेने के लिए कमरे से बाहर निकली, तभी उसे कुछ याद आया और वापस कमरे में घुसने ही वाली थी कि उसे भाभी की दबी हँसी सुनाई दी। वह दरवाजे के बाहर खड़ी हो गयी। भाभी भइया से कुछ कह रहीं थी, पता नहीं क्या सोचकर किरण ने अपने मोबाइल का रिकार्डर आन कर दिया…
"देखा मेरी योजना का कमाल! साँप भी मर गया और लाठी भी न टूटी। कहाँ ये बूढ़ी सारी संपत्ति बेटी के नाम करनेवाली थी और हमें फूटी कौड़ी भी देने को तैयार न थी। वो तो अच्छा हुआ कि कल रात मैंने प्रापर्टी के पेपर पर उनका अंगूठा लगवा लिया था फिर उसके बाद पूजा के दीपक में ढेर सारा घी डालकर कमरे में जला आयी थी और आते-आते उनकी साड़ी का आँचल दीपक पर गिरा गिरा दिया था। दीपक की आग ने हमारा बाकी काम कर दिया। किसी को अनुमान भी न होगा कि अब तक बहू को जलाने वाली आग की लपट उलटी दिशा में भी मुड़ सकती है।"
"लेकिन तुम्हें इतना बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि तुम ऐसा कुछ भी कर सकती हो। आखिर वो मेरी माँ थी। न चाहते हुए भी मुझे अब अपना मुँह बंद रखना पड़ेगा … लेकिन तुम्हारे लिए मेरे हृदय में अब कोई जगह नहीं!"
… 'यह तो भइया की आवाज है… चुप्पी की कीमत तो इन्हें भी चुकानी ही पड़ेगी… '
बिना एक पल गँवाए किरण मोबाइल में पुलिस स्टेशन का नंबर मिलाने लगी।
विभा रानी श्रीवास्तव
1
प्रतिरोध्य
"हे पार्वत्य वासी! सुराधिप! आपने मेरा रास्ता बार-बार बदल कर मुझे, मेरी सखी से विमुख कर दिया। पाक में रहते हुए मैं नापाक हो रही हूँ। हिन्द में ही मेरी संस्कृति अक्षुण्ण रह सकती है..!"
"ना कुछ मेरे समझ में आ रहा है और ना मुझे कुछ याद आ रहा है कि मुझे क्या करना है और मैंने किया क्या है...? मुझसे दूर हटो और शीघ्रता से जाने दो..! मुझे मेघों को दिशा निर्देश देना है कि कहाँ अपना विस्तार रोककर रखें और कहाँ धरा-गगन को एक कर दें।"
"अक्सर आप मद से मत्त हो जाते हैं और अपने अस्त्र के प्रयोग बल पर मेघों और बिजलियों को सही-सही दिशा निर्देश नहीं दे पाते हैं...।"
"मुझ पर मिथ्या आरोप ना लगाओ...!"
"मुझे 'यरलुंग त्संगपो' व 'ब्रह्मपुत्र'' से मिलने जाना है। दो कारुण्य बाहु के मिलन का योग बना दें...! नियति तय की तो 'मेघना' से भी भेंट हो जाएगी।"
"पुनः सोच लो! अब वर्त्तमान काल सती सुहिणी का नहीं रहा..।"
"जुनून की उद्यति मेरे वेग से भी सदैव बड़ी होती रही है सदा होती रहेगी।"
2
आग का छल्ला
नागरिकता संशोधन अधिनियम के पक्ष/विपक्ष पर युवतियों-महिलाओं में चल रहे गर्मागर्म विचार-विमर्श के साथ चल रही किट्टी पार्टी में पूरी तन्मयता से पप्पी सबके थाली को पवित्रता प्रदान करने में भी लगा हुआ था। लपलपाती जीभ और एक व्यंजन का स्वाद ग्रहण कर वह दूसरी सजी थाली की ओर बढ़ जाता। इस प्रकार वह कई चक्करों में प्राय सभी थालियों में सजे व्यंजनों का स्वाद ले चुका था...।
किन्तु इससे वहाँ उपस्थित किसी सदस्य को कोई अन्तर नहीं पड़ रहा था। मेजबान महोदया जिनके यहाँ यह पार्टी चल रही थी ने अपनी थाली में भी पप्पी द्वारा चखे व्यंजनों को नहीं बदला, अपितु प्रफुल्लित होते हुए पप्पी की प्रशंसा करते हुए सारी उपस्थिति को पप्पी की पॉटी के बारे में सगर्व बताने लगी कि एक दिन वह कुछ विलम्ब से घर पहुँची तो पप्पी की समझदारी देखकर अचम्भित रह गई थी।
बताने लगी कि,–"मेरे प्यारे पप्पी ने सोफे, किचन, बेडरूम को बचा दिया था..। मुझे साफ करने में अधिक परेशानी न हो, इसलिए वह वाशिंग मशीन के कोने में जाकर फारिग हुआ..।"
"आपके माता-पिता कब आने वाले हैं...?" श्रीमती सान्याल ने पूछा जो अपनी थाली में अपनी उंगलियों को दोबारा जुम्बिश नहीं दे रही थीं... हदप्रद हुई जब मेजबान पप्पी के पॉटी के बारे में विस्तार से बता रही थी।
"जब इस पिल्ले को घर के बाहर रखने लगेंगी...।" मेजबान की युवा बेटी ने हँसते हुए कहा।
"जरा आपलोग ही बताइए कि इसे कैसे बाहर रखूँ... इसी की वजह से तो यहाँ अमेरिका में नागरिकता मिली है! इस देश के नियमानुसार जिस पिल्ले का जन्म यहाँ होता है उसको यहाँ की नागरिकता मिल जाती है।"
सारी उपस्थितियों में सन्नाटा बिखरा था और शोर गूंज रहा था-
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश
ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है...
विजय आनंद “विजय”
और... कहानी पूरी हो गयी
रविवार का दिन था।वीकेंड की छुट्टियाँ थीं। इसलिए वह घर पर थी। उसने ड्राइंग रूम में खेल रही छ: वर्षीय बेटी से पूछा - "गुड्डा-गुड़िया के साथ खेल रही हो बेटा?"
"हाँ मम्मी। गुड्डे-गुड़िया की शादी करा रही हूँ।"- बेटी ने गुड़िया को तैयार करते हुए कहा।
"अच्छा लाओ, मैं गुड़िया को साड़ी पहना देती हूँ।" कहते हुए वह भी बेटी के पास बैठ गयी और गुड़िया को तैयार करने लगी।
बेटी ने गुड्डे को तैयार किया। उसे खिलौना-कार में बिठाया और फिर मंडप में ले आई।फेरे लगवाए और एक-दूसरे को माला पहनाकर गुड्डे-गुड़िया की शादी कराई।
तब मम्मी ने पूछा - "हो गया न बेटा "
"नहीं मम्मी, अभी नहीं। अभी रुको। अभी शादी पूरी नहीं हुई है।" बेटी ने कहा और दौड़ पड़ी कुछ लाने के लिए।
थोड़ी देर में वह वापस आई, तो मम्मी ने पूछा - "अब क्या करोगी?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बोतल का ढक्कन खोल पूरा किरासन तेल गुड़िया के ऊपर उलट दिया और माचिस जला दी।
गुड़िया धू-धूकर जलने लगी तो उसने मम्मी से कहा - "अब शादी पूरी हो गयी, मम्मी!"
वह स्तब्ध, अवाक् कभी बेटी के चेहरे को, कभी जलती हुई गुड़िया को और कभी आग में धू-धूकर जलते वर्त्तमान को देखती रही...!!
सतीश खनगवाल
1
शरीफ औरत
"सुनो जी।" रात में बिस्तर पर सुमन अपने पति से
बोली - "मैं कह रही थी कि गलती सब से हो जाती है। हेमन्त से भी हो गई।
हालांकि वह भला लड़का है परंतु पता नहीं कैसे वह इस प्रकार की गलती कर बैठा।"
"तुम कहना क्या चाहती हो?"
"देखों गली-मोहल्ले का मामला है। जब से यहाँ आए है, तब से मेहता परिवार से हमारे बहुत अच्छे सम्बन्ध है। उनके
बहुत से अहसान है हमारे ऊपर। आज पूरी रात वो लड़का हवालात में बंद रहेगा, तो उसकी भी अक्ल ठिकाने पर आ जाएगी। मुझे लगता है हमें केस
वापस ले लेना चाहिए।"
"ये तुम क्या कह रही हो? यह कोई छोटी-मोटी
गलती नहीं है, बहुत भारी अपराध है। उस लड़के की हिम्मत तो देखो, उसे जरा भी शर्म नहीं आई। उसे तो मैं सजा दिलवा कर
रहूँगा।"
"आपकी बात अपनी जगह बिल्कुल ठीक है। देखों हमारा तो
कुछ बिगड़ा नहीं, उस लड़के के कारण मेहता परिवार की कितनी छिछालेदार हो
गई हैं। मुझे तो मेहता जी की पत्नी का ख्याल है। सुना है बेचारी दो बार बेहोश हो
चुकी है।"
"तो मैं क्या करूँ, जैसे संस्कार
उन्होंने अपने लड़के को दिए है, वैसे ही
भोगेंगे।"
"देखिए मैं आपसे कह रही हूँ, इतना काफी है, उस लड़के को सबक
सिखाने के लिए। अब वह स्वयं ही आँख नहीं उठा पायेगा। मैं तो कहती हूँ यहीं वक्त
हैं मेहता परिवार के सारे अहसानों का बदला चुकाने का और उन पर अपना अहसान लादने
का। इसके बाद वह कभी आपके सामने सिर नहीं उठा पायेंगे। आप जरा सोचकर देखिए।" रातभर सुमन अपने पति से लिपटी रही और समझाती रही।
सुबह ही कुछ गली वालों को साथ लेकर मेहता परिवार पर
अहसान लादते हुए थाने जाकर शर्मा जी ने केस वापस ले लिया और हेमंत को चेतावनी देकर
छोड़ दिया। शाम को घर के पास वाले पार्क में हेमंत और सुमन का आमना-सामना हो गया।
हेमंत कन्नी काटकर जा ही रहा था कि सुमन ने उसे रोका -
"मुझे माफ कर दो हेमन्त, दरअसल मुझे उस
समय कुछ सूझा ही नहीं। उन्होंने मुझे तुम्हारे साथ देख लिया था। उस समय जो मुझे
सही लगा मैंने वहीं किया। परंतु मैंने किसी तरह उन्हें राजी कर लिया और तुम पर कोई
केस नहीं लगने दिया।"
"मेरे परिवार और मेरी जो बदनामी हुई, उसका क्या? मैं किसी को मुँह
दिखानें लायक नहीं रहा उसका क्या? तुम्हारे कारण
मुझे एक रात हवालात में बितानी पड़ी उसका क्या?" हेमन्त गुस्से से
चीखता हुआ बोला।
"धीरे बोलो हेमन्त। सब सुन लेंगे, आखिर मैं एक शरीफ और इज्ज़तदार औरत हूँ। रही बात तुम्हारी
बदनामी और एक रात में बिताने की तो उसका खामियाजा मैं अगले दो दिनों में चुका
दूंगी। कल मेरे पति दो दिन के लिए बाहर जा रहे है।" अपने होठों को गोल करती
हुई और हेमंत को आँख मारती हुई वह चली गई।
हेमंत ने उसे जाते हुए देखा और बुरा सा मुँह बनाया। वह मन
ही मन उस शरीफ औरत से दूर रहने का प्रण कर चुका था।
2
राह
भाई हर बार
ना-नुकुर करके कुछ ना कुछ मदद कर ही देता था। परंतु इस बार ...। बड़की को अपने भाई
से यह उम्मीद नहीं थी। इसी भाई के पीछे माँ दिन-रात खटती रही थी। इसी भाई के कारण
तीनों बहनों की पढ़ाई-लिखाई ढंग से ना हो पाई। जब भाई इंजीनियर बना तो सोचा था कि
अब सब दुख दूर हो जाएँगे। लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा था कि यह उनके दुखों का अंत
नहीं बल्कि नई शुरुआत है। जब भाई इंजीनियर बनकर आया तो भाभी को साथ ही लाया।
सबसे पहले भाभी ने उस गंदी बस्ती में उनके साथ रहने से मना कर दिया। वह भाई को
लेकर उसी शहर में अलग रहने लगी थी।
अभी-अभी भाभी ने
जो कड़वे बोल उसे बोले थे, उन्हें वह अपने दिमाग से नहीं निकाल पा रही थी। उसने
मन ही मन प्रण कर लिया था कि अब वह कभी भी भाई-भाभी के पास मदद के लिए नहीं जाएगी।
अपनी बीमार माँ की दवा-दारू का खर्च वह खुद उठाएगी। अपनी दोनों छोटी बहनों की
जिम्मेदारी अब वह खुद संभालेगी और घर का सारा खर्च वहन करेगी। परंतु अब वह करेगी क्या? उसे किसी भी
प्रकार अपनी बीमार माँ के प्राण बचाने थे। छोटी बहनों और घर को संभालना था।
सोचते-सोचते वह कब अपनी गंदी बस्ती में लौट आई थी, उसे पता ही नहीं चला। पर ये क्या? उसके कदम घर की ओर नहीं बल्कि सेठ के गोदाम की ओर मुड़ गए
थे। दो घण्टे बाद वह सेठ के गोदाम से हजार रुपये लेकर निकली। उसकी आँखों में आँसू
थे। शरीर बेतरतीब था और कदम बहुत भारी हो रहे थे। अपने आपको संयत कर वह घर पहुँची।
"आज तो बड़ी देर कर
दी बड़की। कहाँ रह गई थी?" माँ ने अपनी खाँसी को रोककर बड़ी मुश्किल से पूछा।
"क्या करूँ माँ, भैया और बच्चे आने ही नहीं दे रहे थे।"
"भैया ने
कुछ...।" माँ का वाक्य अधूरा ही रह गया।
"हाँ माँ। यह देखो
पूरे हजार रुपये दिए है भैया ने इस बार।" बड़की की रूलाई
फूटने ही वाली थी। उसने तुरंत अपना मुँह फेर लिया।
दो साल से बिस्तर पर जिंदगी काट रही माँ के चेहरे पर
संतोष उभरा। वह बेचारी क्या जानती थी, कि पति की मृत्यु
के बाद जिस राह पर चलकर उसने अपनी चारों संतानों को पाला था और बेटे को इंजीनियर
बनाया था। उसकी बड़की भी उसी राह पर चलकर ये हजार रुपये लाई है।
3
दहेज
"अरे, दिनेश तुम, और सुनाओ क्या हाल है?"
"बस ठीक हूँ।" दिनेश ने एक सामान्य सा जवाब दिया।
मुझे वह कुछ दुखी सा दिखाई दिया। फिर भी मैंने बातचीत आगे बढाने के लिए उससे थोड़ा
सा मजाक किया।
"क्या बात है दोस्त, शादी के बाद से
तो तुम ईद का चाँद हो गए हो। लगता है हमारी भाभी ने तुम्हें पूरी तरह से अपने
पल्लू से बांध लिया है।" मात्र एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर एक हल्की सी
मुस्कान आई और गायब हो गई। वह बस की खिड़की
से बाहर देखने लगा। मुझे दिनेश से इस प्रकार के रूखे व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी।
आखिर हम स्कूल के जमाने से दोस्त है। लग रहा था वह अंदर से बहुत दुखी है।
"देखों दिनेश हम दोनों बचपन के दोस्त हैं तुम्हारे साथ
क्या समस्या है मुझे बताओं, हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ। यदि मदद
नहीं भी कर पाया तो भी दुख बाँटने से तुम्हे कुछ राहत ही मिलेगी।" कुछ देर तो
वह आनाकानी करता रहा है। सब ठीक है, कुछ नहीं है, आदि बातें बनाता रहा। परंतु मेरी थोड़ी सी कोशिशों ने उसे
तोड़ दिया।
"तुम तो मेरे घर के हालात जानते ही हो। जो थोड़ी बहुत
जमा-पूंजी पिताजी के पास थी, उससे दोनों बहनों
के हाथ पीले कर दिए थे। पिताजी की इच्छा थी कि मेरी शादी में सारी कसर निकाल ली
जाए। इसी के चलते उन्होंने मेरी शादी एक बहुत बड़े घर में कर दी।"
"ये सब बातें मैं जानता हूँ और यह भी कि गरीब परिवार
से होते हुए भी तुम दहेज विरोधी थे। इसलिए तुमने अपनी शादी में एक रूपये का भी
दहेज स्वीकार नहीं किया। यहाँ तक की लड़की वाले उपहार और जो घरेलू सामान दे रहे थे, उसके लिए भी तुमने इंकार कर दिया था।"
"बस दोस्त शादी के अगले ही दिन से मेरी जिंदगी से खुशी
गायब हो गई। मेरे माता-पिता और बहनों ने मेरे से बातचीत बंद कर रखी है। उनकी नजर
में दहेज ना लेकर मैंने कोई अपराध कर दिया है।"
"ओह...! तो ये बात है?"
"इतना ही नहीं दोस्त बात इससे भी अधिक गंभीर है। मेरी
पत्नी शादी के बाद से ही पिछले छह महीने से अपने मायके में ही बैठी है।"
"लेकिन क्यो?"
"उसे अपने लिए अलग टीवी, फ्रीज और अन्य
सामान चाहिए। अपनी छोटी सी नौकरी में यह सब मैं उसे नहीं दे सकता। वह कहती है कि
जब तुम मुझे यह सब नहीं दे सकते थे, तो जब मेरे
पिताजी दे रहे थे तो मना क्यों किया?"
"क्या...?" आश्चर्य से मेरा
मुँह खुला का खुला रह गया।

बेहतरीन पहल 👌👌
ReplyDeleteस्वागत
Deleteसराहनीय प्रयास।आभार व धन्यवाद।हो सके तो इसे पुस्तक का रूप दिया जाए, ताकि ट्रोलर्स को भी लगे कि इन रचनाओं में कितना दम था।
ReplyDeleteजी, और रचनाओं की दरकार है
Deleteक्या यह भाग दो है?
ReplyDeleteनहीं, वही है, संशोधित किया है
ReplyDeleteआभार सभी का
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